Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीकृष्णचन्द्राष्टकम्

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition1 min read
KrishnaRasaBhakti
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अम्बुदाञ्जनेन्द्रनील–निन्दि–कान्ति–डम्बरःकुंकुमोद्यदर्क–विद्युदंशु–दिव्यदम्बरः।श्रीमदङ्ग – चर्चितेन्दु – पीतनाक्त – चन्दनःस्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र–नन्दनः॥१॥
गण्ड–ताण्डवाति–पण्डिताण्डजेश–कुण्डल–श्चन्द्र–पद्मषण्ड–गर्व–खण्डनास्यमण्डलः।बल्लवीषु वर्धितात्म – गूढ़भाव – बन्धनःस्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र–नन्दनः॥२॥
नित्यनव्य – रूपवेशहार्द – केलिचेष्टितःकेलिनर्म – शर्मदायि – मित्रवृन्द – वेष्टितः।स्वीय–केलि–काननांशु–निर्जितेन्द्र–नन्दनःस्वांघ्रिदास्यदोऽस्तु मे स बल्लवेन्द्र–नन्दनः॥३॥

गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिए अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जिनकी कान्तिकी छटा नूतन–जलधर, अञ्जन एवं इन्द्रनीलमणिका भी तिरस्कार करनेवाली है एवं जिनका पीताम्बर कुंकुम, उदय होनेवाले सूर्य तथा बिजलीकी किरणोंसे भी अधिक शोभायमान है; और जिनका श्रीविग्रह कर्पूर–केसरसे मिले हुए चन्दनसे चर्चित है॥१॥

गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जिनके दोनों कपोलोंपर नृत्य करनेमें परमकुशल मकरकुण्डल विराजमान हैं एवं जिनका मुखमण्डल चन्द्रमा तथा कमलसमूहोंके गर्वका खण्डन करनेवाला है, और जो ब्रजकी गोपियोंके ऊपर अपने गूढभावके बन्धनको बढ़ाते रहते हैं॥२॥

गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जिनका रूप–वेषभूषा–प्रेमभरी क्रीड़ाएँ एवं प्रेममयी चेष्टाएँ, ये सभी नित्य नवीन हैं एवं जो खेलके समय परिहासमय वाक्योंसे सुख देनेवाले मित्रमण्डलसे सदैव घिरे रहते हैं और जो अपने क्रीड़ा–कानन श्रीवृन्दावनकी किरणोंके द्वारा, इन्द्रके नन्दनवनको पराजित करते रहते हैं॥३॥

प्रेमहेम – मण्डितात्म – बन्धुताभिनन्दितःक्षौणिलग्न–भाल–लोकपाल–पालि–वन्दितः।

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