गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिए अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जिनकी कान्तिकी छटा नूतन–जलधर, अञ्जन एवं इन्द्रनीलमणिका भी तिरस्कार करनेवाली है एवं जिनका पीताम्बर कुंकुम, उदय होनेवाले सूर्य तथा बिजलीकी किरणोंसे भी अधिक शोभायमान है; और जिनका श्रीविग्रह कर्पूर–केसरसे मिले हुए चन्दनसे चर्चित है॥१॥
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जिनके दोनों कपोलोंपर नृत्य करनेमें परमकुशल मकरकुण्डल विराजमान हैं एवं जिनका मुखमण्डल चन्द्रमा तथा कमलसमूहोंके गर्वका खण्डन करनेवाला है, और जो ब्रजकी गोपियोंके ऊपर अपने गूढभावके बन्धनको बढ़ाते रहते हैं॥२॥
गोपराजकुमार वे श्रीकृष्ण, मेरे लिये अपने श्रीचरणोंकी सेवा प्रदान करें कि जिनका रूप–वेषभूषा–प्रेमभरी क्रीड़ाएँ एवं प्रेममयी चेष्टाएँ, ये सभी नित्य नवीन हैं एवं जो खेलके समय परिहासमय वाक्योंसे सुख देनेवाले मित्रमण्डलसे सदैव घिरे रहते हैं और जो अपने क्रीड़ा–कानन श्रीवृन्दावनकी किरणोंके द्वारा, इन्द्रके नन्दनवनको पराजित करते रहते हैं॥३॥