भावार्थ—हे सखे! परम औदार्यमयी लीलाका प्रकाश करनेवाले, अपनी अङ्गकान्तिसे तपाये हुए स्वर्ण–कान्तिका तिरस्कार करनेवाले और करोड़ों कामदेवके सौन्दर्यको भी मात करनेवाले शचीनन्दन श्रीगौरहरिके मधुर नाम, रूप, गुण और लीलाओंका तुम गान करो॥१॥
जो भौरोंके मधुर गुञ्जारसे अनुरंजित सुन्दर–सुगन्धित मालती–पुष्पोंकी मालासे सुशोभित हैं, जिनके काले–काले घुंघराले केशकी शोभा काले मेघोंकी छटाको भी पराभूत करती है, जिनके तिलककी शोभा शशधरकी शोभाको भी तुच्छ बना देती है तथा जिनका सुन्दर वेश त्रिभुवनके मनको भी हरण करनेवाला है, हे सखे! तुम, उन श्रीशचीनन्दन गौर हरिके मधुर नाम, रूप, गुण और लीलाओंका ही गान करो॥२॥
जिनके मन्द–मधुर मुस्कानसे तथा अनुपम भावरूपी विलासके द्वारा निखिल देहधारियोंको लुब्ध कर रहे हैं, जिनका अन्तःकरण श्रीमती राधिकाके उन्नतोज्ज्वल प्रेममें विभावित है, जो उक्त दशामें प्रेममय गद्गद वाणीसे श्रीकृष्णका गुणानुवाद कर रहे हैं, हे सखे! तुम, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिके मधुर नाम, रूप, गुण और लीलाओंका प्रीतिपूर्वक गान करो॥३॥
जो परम सौभाग्यवान निष्किञ्चनजनोंको नाम–प्रेमदान रूपी कृपाका वितरण करनेवाले हैं, उन महावदान्य श्रीगौरसुन्दरकी निरुपम लीलाओंका आस्वादन करनेके लोभसे, अत्यन्त दुर्बुद्धियुक्त होनेपर भी यह राधामोहन नामक जन अत्यन्त व्याकुल होकर इस प्रकार वर्णन करता है॥४॥
श्रीराधामोहन दास इस संस्कृत गीतिमें विश्वम्भर श्रीगौरसुन्दरके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना कर रहे हैं, जिन्होंने कलियुगके जीवोंके समस्त पाप–ताप, अपराध आदिको नष्ट कर दिया है, जिन्होंने प्रेमरूपी मधुका पान करनेवाले अपने भक्तोंको अपने गुणरूपी सुगन्धिके द्वारा आकर्षित करके अपनी करुणा द्वारा उनके विरह तापको दूर किया है, जिन्होंने जीवोंके हृदयकी माया, अज्ञान और अविद्याका विनाश करके अपनी कान्तिके द्वारा उनके हृदयकी शोभाको बढ़ाया है। अभिनव–कुट्मल, गुच्छ–समुज्ज्वल–, कुञ्चित–कुन्तल–भार। प्रणयि–जनेरित–, वन्दन–सहकृत–, चूर्णित–वर–घनसार॥
जय जय सुन्दर नन्द–कुमार। सौरभ–सङ्कट, वृन्दावन–तट–, विहित–वसन्त–विहार॥ध्रु.॥
चटुल–दृगञ्चल–, रचित–रसोच्छल–, राधा मदन–विकार। भुवन–विमोहन–, मञ्जुल–नर्त्तन–, गति–वल्गित–मणिहार॥
अधर–विराजित–, मन्दतर–स्मित–, लोचित–निज–परिवार। निज–वल्लवजन, –सुहृत् सनातन, –चित्तविहरदवतार॥