जिनका हृदय नाना प्रकारके भाव–विकारोंसे सर्वदा गद्गद रहता है और जिनका विशाल हुँकार (गर्जन ध्वनि) भक्ति–विमुख पाखण्डियोंके लिए भय उत्पादनकारी है उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥२॥
जो अरुण (गैरिक) वर्णके वस्त्र धारण किए हैं, जिनके चारु कपोल बड़े ही मनोहर हैं जिनके नख–समूहकी कान्ति–छटा पूर्णचन्द्रकी शोभाको भी मात करती है तथा जो अपने नाम–गुणके कीर्तनमें अतिशय आनन्द प्राप्त करते हैं, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥३॥
जिनके नयन–कमलोंसे निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती है, नवरस भाव–विकार जिनके श्रीअंगोंके भूषण–स्वरूप हैं और नृत्य–विलास हेतु जिनकी गति अति मन्थर है, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥४॥
जिनके नुपुर–शोभित श्रीचरण–युगलकी गति अतिशय मनोहर है, उन चन्द्र–विनिन्दित सुशीतल वदन विशिष्ट शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥५॥
जिन्होंने कटितटमें (कमरमें) डोर–बहिर्वास एवं हाथमें दण्ड कमण्डलु धारण कर रखा है, मुण्डन किया हुआ अति भव्य जिनका मस्तक है, जो अतिशय दिव्य कलेवर विशिष्ट हैं, जिनका दण्ड दुर्ज्जनोंके पाप–समूहका खण्डनकारी है, उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥६॥
जिनकी अलकावलि (नृत्यहेतु उठी) धूलिरूप भूषण–विशिष्ट है, जिनका (हरिनाम कीर्तन हेतु) कांपता हुआ बिम्ब सदृश अरुण–अधर बड़ा ही मनोहर लगता है, मलयज चन्दन द्वारा विरचित उज्ज्वल तिलकसे सुशोभित उन शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥७॥
जिनके अरुण नयन कमलदलकी शोभाको तिरस्कार करनेवाले हैं, जो आजानुलम्बित भुजाओंवाले हैं, उन नृत्य–वेशयुक्त कलेवरवाले शचीनन्दन श्रीगौरहरिको प्रणाम करता हूँ॥८॥