Bhajana Gīti
Kirtan

सर्वस्व तोमार

Bhaktivinoda Ṭhākura7 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuHarinamBhakti
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सर्वस्व तोमार, चरणे सँपिया, पड़ेछि तोमार घरे।तुमि त’ ठाकुर तोमार कुकुर, बलिया जानह मोरे॥ 1॥
बाँधिया निकटे, आमारे पालिवे, रहिब तोमार द्वारे।प्रतीप-जनेरे, आसिते ना दिव, राखिब गड़ेर पारे॥ 2॥
तव निजजन, प्रसाद सेविया, उच्छिष्ट राखिबे याहा।आमार भोजन, परम-आनन्दे प्रतिदिन ह’बे ताहा॥ 3॥
बसिया शुइया, तोमार चरण, चिन्तिव सतत आमि।नाचिते-नाचिते, निकटे याइब, यखन डाकिबे तुमि॥ 4॥
निजेर पोषण, कभुना भाविव, रहिव भावेर भरे।भकतिविनोद, तोमार पालक, बलिया वरण करे॥ 5॥

हे भगवान! सर्वस्व आपके चरणों में सौंपकर आपके घर में पड़ा हुआ हूँ। आप मालिक हैं, आप मुझे अपना कुत्ता समझें। (1) अपने पास बाँधकर मुझे पालना। मैं आपके दरवाजे पर रहूँगा। अजनबी लोगों को अर्थात् जो भगवान के भक्त नहीं हैं, उन्हें घर के नजदीक नहीं आने दूँगा, उन्हें तो आप के घर से दूर ही रखूँगा। (2) जब आपके भक्त प्रसाद-सेवन करेंगे तो जो उच्छिष्ट बचेगा, वही मेरा प्रतिदिन का परमानन्दमय भोजन होगा।(3) मैं बैठते-सोते निरन्तर आपके चरणों का चिन्तन करूँगा, जब आप मुझे पुकारेंगे तो नाचते-नाचते आपके पास आऊँगा। (4) हमेशा आपके भाव में विभोर रहूँगा। अपने पोषण की कभी भी चिन्ता नहीं करूँगा। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभो! मैंने आपको अपने पालनकर्ता के रूप में वरण कर लिया है। (5)

जन्म सफल तार,कृष्ण दर्शन यार,भाग्ये हइयाछे एक बार।विकशिया हिन्नयन,करि’ कृष्ण-दर्शन,छाड़े जीव चित्तेर विकार॥
वृन्दावन केलि चतुर वनमाली।त्रिभंग-भंगिमा रूप,वंशीधारी अपरूप,रसमयनिधि, गुणशाली॥
वर्ण नव-जलधर,शिरे शिखिपिच्छवर,अलका-तिलका शोभा पाय।परिधान पीतवास,वदने मधुर हास,हेन रूप जगत् माताय॥
इन्द्रनील जिनि, कृष्ण रूप खानि, हेरिया कदम्बमूले।मन उच्चाटन, ना चले चरण, संसार गेलाम भूले॥
(सखि हे) सुधामय, से रूप माधुरी।देखिले नयन, हय अचेतन, झरे प्रेममय वारि॥
किवा चूड़ा शिरे, किवा वंशी करे, किवा से त्रिभंग ठाम।चरण कमले, आमिया उछले, ताहाते नूपुर दाम॥
सदा आशा करि, भृंगरूप धरि’, चरण-कमले स्थान।अनायासे पाइ, कृष्ण गुण गाइ, आर ना भजिब आन॥
उसका ही जीवन सफल है, सौभाग्य से जिसे कम-से कम एक बार तोश्रीकृष्ण का दर्शन हुआ। दिव्य नेत्रों के विकसित होने पर जीव श्रीकृष्ण कादर्शन करता है और तभी वह चित्त के तमाम विकारों का परित्याग कर देता है।वृन्दावन-क्रीड़ा में वनमाली श्रीकृष्ण बहुत चतुर हैं। त्रिभंग-भंगिमा रूप हैउनका, वंशीधारी अपूर्व रूप के साथ-साथ आनन्द व गुणों के समुद्र हैं वे।उनका वर्ण जलमग्न नवीन बादलों की तरह है, मस्तक पर सुन्दर मयूरपुच्छ वअलका-तिलक शोभा पा रहा है। पीताम्बर पहना हुआ है, मुखारविन्द मेंमधुर-मधुर हंसी है— इस प्रकार के रूप ने सारे जगत् को पागल बना दिया है।रूप निधि इन्द्रनील जो श्रीकृष्ण हैं, उन्हें कदम्ब वृक्ष के नीचे देखकर मेरा मनअति उत्कण्ठित हो गया। उस अवस्था में चरणों का चलना सम्भव न हुआतथा सारे संसार को मैं भूल गया। हे सखी! वह रूप-माधुरी अति-अमृतमयहै। उसे नयनों से निहारने से जीव अचेतन हो जाता है तथा आँखों से प्रेम कीबरसात होने लग जाती है। सिर पर क्या चूड़ा है, क्या वह वंशी है करों में तथाक्या वह त्रिभंग ठाम है— अर्थात् सभी अनुपम हैं। चरण-कमलों में अमृतछलकता है तथा उनमें नूपुर बँधे हैं। हमेशा मेरी यही आशा रहती है कि मुझेउन चरण-कमलों में एक भौंरे के रूप में स्थान मिल जाए। ऐसा होने परअनायास ही उनके दर्शन मुझको सुलभ हो जाएँगे और मैं हमेशा श्रीकृष्ण कागुणगान गाता रहूँगा। मैं संकल्प करता हूँ कि मैं और किसी का भी भजन नहींकरूँगा।आत्मनिवेदन,तुया पदे करि’,हइनु परम सुखी।दुःख दूरे गेल,चिन्ता ना रहिल,चौदिके आनन्द देखि॥ 1॥
अशोक-अभय,अमृत-आधार,तोमार चरणद्वय।ताहाते एखन,विश्राम लभिया,छाड़िनु भवेर भय॥ 2॥
तोमार संसारे,करिब सेवन,नहिब फलेर भागी।तव सुख याहे,करिब यतन,ह’ये पदे अनुरागी॥ 3॥
तोमार सेवाय,दुःख हय यत,सेओ त’परम सुख।सेवा-सुख-दुःख,परम सम्पद,नाशये अविद्या-दुःख॥ 4॥
पूर्व इतिहास,भुलिनु सकल,सेवा-सुख पेये मने।आमि त’ तोमार,तुमि त’ आमार,कि काज अपर धने॥ 5॥
भकतिविनोद,आनन्दे डुबिया,तोमार सेवार तरे।सब चेष्टा करे,तब इच्छा-मत,थाकिया तोमार घरे॥ 6॥

आपके चरणों में आत्मनिवेदन करके मैं अत्यधिक सुखी हो गया हूँ। मेरे तमाम दुःख चले गये हैं और अब कोई चिन्ता नहीं रह गयी है। चारों तरफ आनन्द ही आनन्द देखता हूँ।(1) आपके युगल-चरण शोक-रहित, भय- रहित एवं अमृत के आधार हैं। उनमें विश्राम प्राप्त करके अब मैंने भव-भय को भी छोड़ दिया है। (2) आपका पदानुरागी बनकर मैं आपके संसार में सेवा करूँगा और फल का भागीदार भी नहीं बनूँगा। आपका सुख जिसमें होगा, उसके लिये ही प्रयत्न करूँगा। (3) आपकी सेवा में जो दुःख होंगे वही मेरे लिये परम सुख होगा। सेवा करने में प्राप्त होने वाले सुख-दुख ही सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं क्योंकि ये अविद्या-दुःख को नाश कर देते हैं। (4) आपकी सेवा का सुख प्राप्त करके मैं अपने पूर्व इतिहास को भूल गया हूँ। अब तो बस इतना ही याद है कि मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। औरों से मेरा क्या वास्ता है। (5)

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर आपके घर में रहकर आनन्द में आप्लावित होकर, आपकी प्रसन्नता के लिये, आपकी इच्छा के मुताबिक तमाम चेष्टायें करते हैं। (6)

कोथाय गो प्रेममयि राधे राधे।राधे राधे गो जय राधे राधे ॥ 1॥
देखा दिए प्राण राख राधे राधे।तोमार कांगाल तोमाय डाके राधे राधे॥ 2॥
राधे वृन्दावन - विलासिनी राधे राधे।राधे कानुमनोमोहिनी राधे राधे ॥ 3॥
राधे अष्टसखीर शिरोमणि राधे राधे।राधे वृषभानुनन्दिनीराधे राधे ॥ 4॥
(गोसाञि) नियम करे सदाइ डाके, राधे राधे।(गोसाञि) एक बार डाके केशीघाटे।आबार डाके वंशीवटे राधे राधे॥ 5॥
(गोसाञि) एक बार डाके निधुवने।आबार डाके कुञ्जवने राधे राधे॥ 6॥
(गोसाञि) एक बार डाके राधाकुण्डे।आबार डाके श्यामकुण्डे राधे राधे॥ 7॥
(गोसाञि) एक बार डाके कुसुमवने।आबार डाके गोवर्धने राधे राधे॥ 8॥
(गोसाञि) एक बार डाके तालवने।आबार डाके तमालवने राधे राधे॥ 9॥
(गोसाञि) मलिन वसन दिये गाय।व्रजेर धूलाय गड़ागड़ि जाय राधे राधे॥ 10॥
(गोसाञि) मुखे राधा राधा बले।भेसे नयनेर जले राधे राधे ॥ 11॥
(गोसाञि) वृन्दावने कूलिकूलि केंदे बेड़ाय,राधा बलि राधे राधे॥ 12॥
(गोसाञि) छाप्पान्न दण्ड रात्रि दिने।जाने ना राधा - गोविन्द बिने राधे राधे॥ 13॥
तारपर चारि दण्ड शुति थाके।स्वप्रे राधा - गोविन्द देखे राधे राधे॥ 14॥

प्रस्तुत कीर्तन को श्रील गौरकिशोर दास बाबा जी महाराज गाया करते थे तथा ऐसा भी कहा जाता है कि ये कीर्तन श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी जी के उद्देश्य में रचित हुआ। हे प्रेममयी राधे! आप कहाँ हैं? आपका यह कंगाल दास आपको पुकार रहा है। एक बार दर्शन प्रदानकर मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। हे वृन्दावन विलासिनी श्रीराधे! हे श्रीश्यामसुन्दर के मन को भी हरण करनेवाली श्रीराधे! हे ललिता, विशाखा आदि अष्ट सखियों की शिरोमणि, वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे! इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी सदा नियमपूर्वक श्रीमती राधिकाजीको पुकारते हैं। कभी केशीघाट में पुकारते हैं, तो कभी वंशीवट में, कभी निधुवन में तो कभी कुंजवन में, कभी राधाकुण्ड में तो कभी श्यामकुण्ड में, कभी कुसुम सरोवर में, तो कभी गोवर्धन में, कभी तालवन में, तो कभी तमालवन में। शरीर पर मलिन वस्त्र धारणकर ब्रजकी धूल में लोटपोट हो रहे हैं तथा मुख से हे राधे! हे राधे! पुकारते हुए उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह रही है। वे वृन्दावन की गलियों में रोते-रोते राधे-राधे कहते हुए घूमते हैं। वे रात-दिन छप्पन दण्ड राधा-गोविन्द की सेवा में ही निमग्न रहते हैं तथा मात्र चार दण्ड शयन करते हैं। परन्तु सोते हुए स्वप्र में भी राधागोविन्द के दर्शन करते हैं।

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