दैन्य-बोधिका-प्रार्थना
हरि! हरि!! मैंने तो वृथा ही अपना जन्म गंवा दिया। सदुर्लभ मनुष्य जीवन पाकर भी मैंने श्रीराधा-कृष्ण जी का भजन नहीं किया। मैंने जानबूझ कर सांसारिक विषय रूप विष को खा लिया। गोलोक का प्रेमधन, जो हरिनाम- संकीर्त्तन है, उसमें मेरी जरा सी भी रति-मति नहीं हुई तथा संसार रूपी विषानल से दिन-रात मेरा हृदय जल रहा है,इसको शीतल करने का भी उपाय मैंने नहीं किया। जो व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं, वे ही शचीनन्दन-गौरांग रूप से अवतीर्ण हुए हैं तथा बलराम जी नित्यानन्द प्रभु हो गये हैं। जितने भी दीन-हीन थे, सभी का इन्होंने हरिनाम-संकीर्तन के द्वारा उद्घार कर दिया, इस बात के गवाह जगाइ और माधाइ हैं। हे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण! आप वृषभानुसुता श्रीमति राधा रानी के साथ एक बार मुझ पर करुणा कीजिये। नरोत्तम ठाकुर जी कहते हैं, हे प्रभो! आप मुझे अपने इन अरुणवर्ण चरण-कमलों से दूर मत करना। आपके बिना मेरा और है ही कौन?