Bhajana Gīti
Kirtan

भूलिया तोमारे

Bhaktivinoda Ṭhākura4 min read
Guru TattvaMahaprabhuHarinamBhakti
PDF
भूलिया तोमारे, संसारे आसिया, पेये नानाविध व्यथा।तोमार चरणे, आसियाछि आमि, बलिब दुःखेर कथा॥ 1॥
जननी - जठरे, छिलाम यखन, विषम बन्धन-पाशे।एक बार प्रभु! देखा दिया मोरे, वन्चिले ए दीन दासे॥ 2॥
तखन भाविनु, जनम पाइया, करिव भजन तव।जनम हइल, पड़ि’ माया-जाले, ना हइल ज्ञान-लव॥ 3॥
आदरेर छेले, स्वजनेर कोले, हासिया काटानु काल।जनक - जननी - स्नेहेते भुलिया, संसार लागिल भाल॥ 4॥
क्रमे दिन - दिन, बालक हइया, खेलिनु बालक-सह।आर किछु दिने, ज्ञान उपजिल, पाठ पढ़ि अहरहः॥ 5॥
विद्यार गौरवे, भ्रमि’ देशे देशे, धन उपार्जन करि’।स्वजन - पालन, करि एक मने, भूलिनु तोमारे, हरि!॥ 6॥
वार्द्धक्ये एखन, भक्तिविनोद, काँदिया कातर अति!ना भजिया तोरे, दिन वृथा गेल, एखन कि ह’वे गति! ॥ 7॥

हे प्रभो! मैं तुम्हें भूलकर इस संसार में आ गया हूँ और नाना प्रकार के कष्ट पा रहा हूँ। अब मैं आपकी शरण में आ गया हूँ और अपने दुख की बात कहता हूँ। (1) नाना प्रकार के बन्धनों से बँधा हुआ जब मैं माता के गर्भ में था तब आपने सिर्फ एक बार दर्शन दिया और फिर इस दीन दास को अपने दर्शनों से वन्चित कर दिया। (2) तब सोचा था कि जन्म होने के बाद मैं आपका भजन करूँगा परन्तु जब जन्म हुआ तो माया जाल में फंसकर जरा सा भी ज्ञान नहीं रहा। (3) स्नेही पुत्र बनकर परिवार वालों की गोद में मैंने हंसकर समय को गुजारा, माता-पिता के स्नेह में सब कुछ भूल गया और मुझे संसार ही अच्छा लगने लगा। (4) धीरे-धीरे जब मैं बालकपन पर पहुँचा तो अन्यान्य बालकों के साथ खूब खेला और थोड़े दिनों बाद जब थोड़ा ज्ञान उपजा तो निरन्तर पढ़ाई करने लगा। (5) विद्या के घमण्ड में चूर होकर पैसा कमाने के लिये मैं देश-विदेश में घूमा तथा दत्तचित्त होकर अपने परिवार का पालन- पोषण करने लग गया, परन्तु हे प्रभु ! आपको भूल गया। (6) श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि अब बुढ़ापे के कारण मैं अति व्याकुल हो कर रो रहा हूँ। हे प्रभु! आपका भजन नहीं किया, सारी ज़िन्दगी बेकार चली गयी, अब मेरी क्या गति होगी? (7)

एखन बुझिनु प्रभो ! तोमार चरण।अशोक - अभयामृत - पूर्ण सर्वक्षण॥ 1॥
सकल छाड़िया तुया चरण कमले।पड़ियाछि आमि नाथ! तव पदतले॥ 2॥
तव पादपद्म, नाथ ! रक्षिवे आमारे।आर रक्षाकर्त्ता नाहि ए भव संसारे॥ 3॥
आमि तव नित्यदास - जानिनु एबार।आमार पालन - भार एखन तोमार॥ 4॥
बड़ दुःख पाइयाछि स्वतन्त्र जीवने।सब दुःख दूरे गेल ओ - पद वरणे॥ 5॥
ये - पद लागिया रमा तपस्या करिला।ये-पद पाइया शिव शिवत्त्व’ लभिला॥ 6॥
ये - पद लभिया ब्रह्मा कृतार्थ हइला।ये - पद नारद - मुनि हृदय धरिला॥ 7॥
सेइ से अभयपद शिरेते धरिया।परम-आनन्दे नाचि पद-गुण गाइया॥ 8॥
संसार - विपद ह’ ते अवश्य उद्धार।भक्तिविनोद, पद करिबे तोमार ॥ 9॥

हे प्रभो! आपके चरणों की महिमा अब समझ में आयी है कि ये अशोक, अभय व अमृत से सर्वदा परिपूर्ण हैं। (1) हे नाथ! सब कुछ छोड़कर अब मैं आपके ही आश्रय में रह रहा हूँ। हे नाथ! अपने पादपद्मों में ही मुझको रखना, क्योंकि इस भव-संसार में आपको छोड़कर और कोई मेरा रक्षाकर्ता नहीं है। (2-3) अब मेरी समझ में आया है कि मैं आपका नित्य दास हूँ। मेरे पालन-पोषण का सब भार अब आपका ही है। (4) मैंने स्वतन्त्र जीवन में बहुत कष्ट पाया है, परन्तु आपके चरणों को वरण कर लेने के कारण मेरे सब दुःख चले गये हैं। (5) जिन पाद-पद्मों को प्राप्त करने के लिये ही लक्ष्मी जी ने तपस्या की, जिन चरणों को प्राप्त करके ही शिवजी को शिवत्त्व प्राप्त हुआ। (6) जिन पाद-पद्मों को प्राप्त करके ही ब्रह्माजी कृतार्थ हुए, जिन पाद-पद्मों को नारद जी ने हृदय में धारण किया। उन्हीं अभय पाद-पद्मों को मस्तक पर धारण करके मैं उनका गुण कीर्तन करता हुआ परम आनन्द से नृत्य कर रहा हूँ। (7-8) श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि आपके इन श्रीचरणों की कृपा से मेरा इस संसार-विपद से अवश्य उद्घार होगा। (9)

Continue the Journey