Bhajana Gīti
Kirtan

ओरे मन, भाल नाहि

Bhaktivinoda Ṭhākura5 min read
Guru TattvaKrishnaBhakti
Study with Shastra AIPDF
ओरे मन, भाल नाहि लागे ए संसार।जन्म-मरण-जरा,ये संसारे आछे भरा,ताहे किबा आछे बल’ सार॥
धन-जन-परिवार,केह नहे कभु का’र,काले मित्र, अकाले अपर।याहा राखिवारे चाइ,ताहा नाहि थाके भाई,अनित्य समस्त विनश्वर॥
आयु अति अल्पदिन,क्रमे ताहा हय क्षीण,शमनेर निकट दर्शन।रोग-शोक अनिवार,चित्त करे छारखार,बान्धव-वियोग दुर्घटन॥
भाल क’ रे देख भाई,अमिश्र आनन्द नाइ,ये आछे, से दुःखेर कारण।से सुखेर तरे तबे,केन माया-दास ह’बे,हाराइवे परमार्थ धन॥
इतिहास आलोचने,भेवे देख निज मने,कत आसुरिक दुराशय।इन्द्रियतर्पण सार,करि’ कत दुराचार,शेषे लभे मरण निश्चय॥
मरण समय ता’रा,उपाय हइया हारा,अनुताप-अनले ज्वलिल।कुक्कुरादि पशु प्राय,जीवन काटाय हाय,परमार्थ कभुना चिन्तिल॥
एमन विषये मन,केन थाक अचेतन,छाड़ छाड़ विषयेर आशा।श्रीगुरु-चरणाश्रय,कर सबे भव जय,ए दासेर सेइ त’ भरोसा॥
ओरे मन! ये संसार मुझे अच्छा नहीं लगता। जन्म-मरण व बुढ़ापाजिस संसार में भरा पड़ा है — कहो तो उसमें सार क्या है? यह धन, यह जन,यह परिवार — ये कोई किसी का नहीं है। ये सभी अच्छे समय के मित्र हैं औरबुरे समय में सब पराए हो जाएँगे क्योंकि इस संसार का सभी कुछ अनित्य वनाशवान है, इसलिए जिसको भी तू सँभालना चाहता है, वह रहता नहीं है।फिर आयु अति अल्प दिन की है, और जो है वह भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है— देखो सामने ही तो काल के दर्शन हो रहे हैं। इसके इलावा चित्त को उथल-पुथल कर देने वाले रोग-शोक भी अनिवार्य हैं। बान्धवों के वियोग कीघटनाएँ भी अवश्य ही घटित होती रहती हैं। अतः मेरे मन! भली भाँति देख,इस संसार में विशुद्ध आनन्द नहीं है,जो सुख हैं वह भी दुःखों के कारण ही हैं।दुःख के दूत-स्वरूप, इस तथाकथित सुख के लिए क्यों तू माया-दास बनेगाऔर परमार्थ-धन को खो बैठेगा। पूर्व इतिहास की आलोचना करके जराअपने मन में विचार कर देख कि आज से पहले कितने दुराशय असुर हुये।अपने इन्द्रिय-तर्पण के लिए उन्होंने कितना दुराचार किया, परन्तु परिणाम मेंउन सभी को मरना पड़ा और मरने के समय अपने उद्घार का कोई उपाय न देखकर अनुताप की आग में जलते रहे वह। हाय! हाय!! कुत्ते आदि पशुओं कीतरह तू जीवन बिता रहा है, परमार्थ की चिन्ता भी नहीं की तूने। इस प्रकार केविषयों में हे मन, तू क्यों बेहोश सा रहता है — मैं कहता हूँ इन विषयों कीआशा को तूँ छोड़ दे—छोड़ दे। इसलिए हे मन! तू अब श्रीगुरु पाद-पद्मों काआश्रय कर, ऐसा करने से तू इस संसार से पार हो जाएगा, इस दास को यहीभरोसा है।दुर्लभ मानव - जन्म लभिया संसारे।कृष्ण ना भजिनु , दुःख कहिब काहारे॥
‘संसार’ ‘संसार’ क’ रे मिछे गेल काल।लाभ ना हइल किछु , घटिल जंजाल॥
किसेर संसार एई, छायाबाजी प्रायः।इहाते ममता करि वृथा दिन याय॥
ए देह पतन ह’ ले कि र’वे आमार।केह सुख नाहि दिवे पुत्र - परिवार॥
गर्दभेर मत आमि करि परिश्रम।का’ र लागि’ एत करि ना घुचिल भ्रम॥
दिन याय मिछा काजे, निशा निद्रावशे।नाहि भावि मरण निकटे आछे व’ से॥
भाल मन्द खाइ, हेरि, परि, चिन्ताहीन।नाहि भावि, ए देह छाड़िव कोन दिन॥
देह - गेह - कलत्रादि चिन्ता अविरत।जागिछे हृदये मोर बुद्धि करि’ हत॥
हाय हाय नाहि भावि, अनित्य ए सब।जीवन विगते कोथा रहिवे वैभव॥
श्मशाने शरीर मम पड़िया रहिवे।विहंग पतंग ताय विहार करिवे॥
कुक्कुर श्रृगाल सब आनन्दित ह’ ये॥
महोत्सव करिवे आमार देह ल’ ये॥
ये देहेर एइ गति, ता’ र अनुगत।संसार - वैभव आर बन्धुजन यत॥
अतएव माया मोह छाड़ि’ बुद्धिमान्।नित्यतत्त्व कृष्ण भक्ति करुन सन्धान॥

इस संसार में दुर्लभ मानव जन्म प्राप्त करके भी मैंने श्रीकृष्ण भजन नहीं किया — अपना ये दुःख कहूँ तो किसको कहूँ। संसार-संसार करते-करते समय व्यर्थ चला गया। लाभ तो कुछ हुआ ही नहीं, बल्कि जंजाल ही जंजाल बढ़ गया। किसका ये संसार है; अरे ये तो परछाईं की तरह है — इससे ममता करने से तो दिन फ़िजूल में ही गुजर जाता है और इस शरीर का पतन हो जाने से क्या रहेगा? ये पुत्र व परिवार इत्यादि कोई भी मुझको सुख नहीं देगा। गधे की तरह मैं परिश्रम करता हूँ। किए लिये मैं इतना सब करता हूँ? — ये भ्रम मेरा टूटा नहीं। दिन व्यर्थ के कार्यों में और रात सोने में गुजर जाती है। कभी भी नहीं सोचता कि मृत्यु सामने आकर बैठी हुई है। अच्छा-बुरा जैसा भी मिलता है, खा लेता हूँ और निश्चिन्त होकर पड़ा रहता हूँ — जरा सा भी नहीं सोचता कि इस शरीर को एक दिन मुझे छोड़ना पड़ेगा। निरन्तर शरीर, घर व स्त्री आदि की ही चिन्ता लगी रहती है और इन चिन्ताओं के हृदय में जाग जाने से इन्होंने मेरी बुद्धि को खत्म कर दिया है। हाय! हाय! जरा भी नहीं सोचता कि ये सब तो अनित्य हैं और जीवन की समाप्ति पर ये सारा वैभव कहाँ रहेगा। श्मशान में मेरा शरीर पड़ा रहेगा और चील, कौवे आदि उस पर मंडराएँगे। कुत्ते व सियार आदि आनन्दित होकर मेरी देह का महोत्वस मनाएँगे — जिस देह की यह गति है उसका व अनित्य सांसारिक-वैभव व बन्धुगणों का मैं आनुगत्य कर रहा हूँ। अतएव बुद्धिमान मनुष्यों को चाहिए कि वे इस माया- मोह को छोड़कर नित्यतत्त्व, जो श्रीकृष्ण भक्ति है, उसका अनुसन्धान करें।

Continue the Journey