हे व्रजेन्द्र कुमार! आप ही तमाम ईश्वरों के ईश्वर हो, आपकी इच्छा से ही विश्व का सृजन व संहार होता है। (1)आपकी इच्छा के मुताबिक ही ब्रह्माजी सृजन करते हैं, आपकी इच्छा के अनुसार ही विष्णु जी पालन करते हैं। (2)
आपकी इच्छा के मुताबिक ही शिवजी संहार करते हैं व आपकी इच्छा के अनुसार ही माया इस कारागार का सृजन करती है। (3) आपकी इच्छा के मुताबिक ही जीवों का जन्म-मरण, समृद्धि-पतन, व दुःख-सुख आदि सम्यक रूप से घटित होता है। (4) जीव फिज़ूल में ही आशा के पीछे फिरता है —परन्तु आपकी इच्छा के बिना कुछ नहीं कर पाता। (5) आप ही तो मेरे रक्षाकर्ता व पालनकर्ता हो। आपके चरणों को छोड़कर मेरी और कोई आशा नहीं है।(6) मैं अपने बल की चेष्टा का भरोसा छोड़कर आपकी इच्छा पर ही निर्भर रह रहा हूँ। (7) श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि मैं अति दीन-अकिंचन हूँ। आपकी इच्छा के मुताबिक ही मेरा जीवन-मरण है। (8)