Bhajana Gīti
Kirtan

महाप्रसादे गोविन्दे (प्रसाद-सेवा कीर्तन)

Bhaktivinoda Ṭhākura3 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaHarinam
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महाप्रसादे गोविन्दे नाम-ब्रह्मणि वैष्णवे।स्वल्प पुण्यं वतान् राजन् विश्वासो नैव जायते॥
शरीर अविद्या-जाल,जड़ेन्द्रिय ताहे काल,जीवे फेले विषय-सागरे।तार मध्ये जिह्वा अति,लोभमय सुदुर्मति,ता’के जेता कठिन संसारे।कृष्ण बड़ दयामय,करिवारे जिह्वा जय,स्वप्रसाद अन्न दिल भाई।सेइ अन्नामृत पाओ,राधाकृष्ण गुण गाओ,प्रेमे डाक चैतन्य-निताइ॥
महाप्रसाद में, गोविन्द भगवान् में, हरिनाम में, ब्राह्मणों में तथा वैष्णवोंमें थोड़े पुण्य से विश्वास नहीं उपजता। ये शरीर अविद्या का जाल है तथाजड़ीय इन्द्रियाँ इसमें काल स्वरूप हैं जो कि जीव को विषय के सागर में फैंकदेती हैं। इनमें भी जो जिह्वा है, ये अति लोभी है, सुदुर्मति है। संसार में इसेजीतना बड़ा कठिन है। हे भाई! श्रीकृष्ण बड़े दयालु हैं, उन्होंने इस जिह्वा सेविजय दिलाने के लिये अपना अन्न प्रसाद दिया है। इस अमृतमय अन्न कोपाओ तथा श्रीराधा-कृष्ण जी के गुण गाओ एवं प्रेमपूर्वक श्रीचैतन्य महाप्रभु वनित्यानन्द प्रभु को पुकारो।श्रीराधाकृष्ण जी के चरणों में विज्ञप्तिश्रीराधाकृष्ण पदकमले मन ।केमने लभिवे चरम शरण ॥ 1॥
चिरदिन करिया ओ-चरण-आश।आछे हे बसिया ए अधम-दास॥ 2॥
हे राधे! हे कृष्णचन्द्र! भकतप्राण।पामरे युगल - भक्ति कर दान॥ 3॥
भक्तिहीन बलि’ ना कर उपेक्षा।मूर्खजने देह - ज्ञान सुशिक्षा ॥ 4॥
विषय - पिपासा प्रपीड़ित दासे।देहि अधिकार युगल विलासे॥ 5॥
चंचल जीवनस्रोत प्रवाहिया,कालेर सागरे धाय।गेल ये दिवस,ना आसिबे आर,एबे कृष्ण कि उपाय॥ 6॥
तुमि पतितजनेर बन्धु।जानि हे तोमारे नाथ, तुमि त करुणा-जलसिन्धु॥ 7॥
आमि भाग्यहीन,अति अर्वाचीन,ना जानि भकति-लेश।निजगुणे नाथ,कर आत्मसात्,घुचाइया भव क्लेश॥ 8॥
सिद्ध-देह दिया,वृन्दावन माझे,सेवामृत कर दान।पियाइया प्रेम,मत्त करि’ मोरे,शुन निज गुणगान॥ 9॥
युगल सेवाय,श्रीरासमण्डले,नियुक्त कर आमाय।ललिता सखीर,अयोग्या किंकरी,विनोद धरिछे पाय॥ 10॥

ऐ मन! तुम कैसे श्रीराधा-कृष्ण जी के चरण कमलों की शरण ग्रहण कर पाओगे? (1) बहुत दिनों से उन चरणों की आशा में ये अधम दास बैठा हुआ है। (2) भक्तों के प्राण-स्वरूप हे राधे! हे कृष्ण! इस पामर को युगल- भक्ति प्रदान कीजिये। (3) भक्तिहीन कहकर मेरी उपेक्षा मत करना, दया करके इस मूर्ख व्यक्ति को ज्ञान-सुशिक्षा प्रदान कीजिये। (4) विषयों की प्यास इस दास को प्रपीड़ित कर रही है। कृपा करके इसे युगल-विलास का अधिकार प्रदान कर दीजिये। (5) जीवन बहुत ही चंचल है। ये नदी के बड़े स्त्रोत की तरह काल रूप सागर की ओर दौड़ रहा है। जो दिन चला जा रहा है वह तो अब लौटकर नहीं आयेगा। हे कृष्ण! इसका क्या उपाय है? (6) आप तो पतितों के बन्धु हैं, हे नाथ! मैं जानता हूँ कि आप करुणा के सिन्धु हैं।(7) मैं अनादिकाल से ही भाग्यहीन हूँ। मैं भक्ति का लेशमात्र भी नहीं जानता। हे नाथ! आप अपने गुणों से मुझे आत्मसात् कर लीजिये तथा मेरे इस भव-क्लेश को खत्म कर दीजिये। (8) वृन्दावन में सिद्ध देह देकर मुझे अपने सेवामृत का दान दीजिये। अपना ‘प्रेम’ पिलाकर मुझे मत्त कर दीजिए तथा उस प्रमोन्मत अवस्था में मुझसे आप अपने गुणगान सुनिये। (9) श्रीरास-मण्डल में, अपनी युगल सेवा में मुझे नियुक्त कर दीजिये। ललिता सखी की अयोग्य-किंकरी भक्तिविनोद आपके चरण पकड़ता है।(10)

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