जाको पत्र - मंजरी कोमल।श्रीपति चरण-कमल लपटानी! नमो नमः॥
धन्य तुलसी पूर्ण तप किये।श्रीशालग्राम महापटरानी ! नमो नमः॥
धूप, दीप, नैवेद्य आरती।फूलन किये बरखा बरखानी! नमो नमः॥
छप्पन भोग छत्तीस व्यंजन।बिना तुलसी प्रभु एक नाही मानी! नमो नमः॥
शिव, शुक, नारद और ब्रह्मादिक।ढूँढत फिरत महामुनि ज्ञानी! नमो नमः॥
चन्द्रशेखर मैया तेरो यश गावे।भक्ति-दान दीजिये महारानी! नमो नमः॥
तुलसी महारानी वृन्दे महारानी! नमो नमः॥
हे तुलसी महारानी! आपको नमस्कार है। हे वृन्दे महारानी! आपको नमस्कार है। मैया जी! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे नारायणी! आपको नमस्कार है। आपके दर्शन से व स्पर्श से जीव के तमाम पाप खत्म हो जाते हैं — आपकी ऐसी महिमा का वेद व पुराण बखान करते हैं। आपके पत्ते व कोमल-कोमल मंजरी श्रीपति नारायण जी के श्रीचरणों में लिपटी रहती हैं। हे तुलसी जी! आप धन्य हैं। आपने पूर्ण तप किया है, जिससे आप शालग्राम जी की पटरानी कहलाती हो। धूप-दीप व नैवेद्य आपको अर्पण किये जाते हैं। आपकी आरती होती है तथा फूलों की वर्षा बरसायी जाती है। छप्पन-भोग व छत्तीसों प्रकार के व्यंजन तुलसी के बिना भगवान् ग्रहण नहीं करते। शिव जी महाराज, शुकदेवजी महाराज, नारद गोस्वामी जी तथा ब्रह्मा आदि महामुनि ज्ञानी आपको ढूँढते फिरते रहते हैं (अथवा तुलसी जी की परिक्रमा करते रहते हैं)। चन्द्रशेखर जी, मैया! आपका यशगान करते हैं। हे महारानी! आप भक्ति का दान दीजिये। तुलसी महारानी! वृन्दे महारानी! आपको नमस्कार है।