Bhajana Gīti
Kirtan

सन्ध्या - आरती

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
Guru TattvaMahaprabhuNityanandaBhakti
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जय जय गोराचाँदेर आरती को शोभा।जाह्नवी - तटवने जग - मन लोभा॥ 1॥
दक्षिणे निताइचाँद, वामे गदाधर।निकटे अद्वैत, श्रीनिवास छत्रधर॥ 2॥
बसियाछे गोराचांद रत्नसिंहासने।आरती करेन ब्रह्मा - आदि देवगणे॥ 3॥
नरहरि - आदि करि’ चामर ढुलाय।संजय - मुकुन्द वासुघोष-आदि गाय॥ 4॥
शंख बाजे, घण्टा बाजे, बाजे करताल।मधुर मृदंग बाजे परम रसाल॥ 5॥
बहु कोटि चन्द्र जिनि’ वदन उज्ज्वल।गलदेशे वनमाला करे झलमल॥ 6॥
शिव - शुक - नारद प्रेमे गदगद।भक्तिविनोद देखे गोरार संपद ॥ 7॥

सारे संसार के मन को लुभाने वाली गंगा जी के तट पर हो रही श्रीगौरचन्द्र जी की आरती की शोभा की जय हो, जय हो। दाहिनी ओर नित्यानन्द प्रभु, बायीं ओर श्रीगदाधर जी हैं तथा उनके पास श्रीअद्वैत-आचार्य जी हैं एवं श्रीनिवास जी छत्र पकड़े खड़े हैं। रत्न-सिंहासन पर गौरचन्द्र जी विराजमान हैं तथा ब्रह्मा इत्यादि देवगण उनकी आरती करते हैं। श्रीमान् नरहरि आदि चामर ढुलाते हैं। श्रीसंजय, मुकुन्द तथा वासुदेव घोष आदि भक्त लोग गाते हैं। शंख बजते हैं, घण्टे बजते हैं, करताल बजते हैं तथा परम- रसमय -ताल में मधुर मृदंग बजते हैं। करोड़ों चन्द्रमाओं की तरह जिनका उज्ज्वल मुखारविन्द है, उनके गले में वनमाला झलमल-झलमल करती रहती है। इन सब दृश्यों को देखकर शिव जी महाराज, शुकदेव जी व भक्त-प्रवर नारद जी प्रेम में गद्गद हो उठते हैं तथा भक्तिविनोद ठाकुर जी इस गौर- सम्पदा का दर्शन करते रहते हैं।

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