Bhajana Gīti
Kirtan

गौर ना हइत

Vāsudeva Ghoṣa1 min read
RadhaMahaprabhuBhakti
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(यदि) गौर ना हइत, तबे कि हइत, केमने धरिताम दे’।राधार महिमा प्रेमरस - सीमा, जगते जानात के ? ॥
मधुर वृन्दा - विपिन माधुरी , प्रवेश चातुरी सार।वरज युवती, भावेर भकति, शकति हइत का’र? ॥
गाओ - गाओ पुनः, गौरांगेर गुण, सरल करिया मन।ए भव सागरे एमन दयाल, ना देखिये एकजन।।(आमि) गौरांग बलिया, ना गेनु गलिया, केमने धरिनु दे’।वासुर - हिया, पाषाण दिया, (विधि) केमने गड़ियाछे॥

यदि गौरांग महाप्रभु जी न होते तो तब क्या होता? मैं किस प्रकार अपने इस शरीर को धारण करता? राधा जी की महिमा व उन्नत उज्ज्वल रस की बात जगत् को कौन बताता? मधुर वृन्दावन की जो माधुरी है, उसमें प्रवेश पाने का चातुर्य ही सार है तथा व्रज-गोपियों की जो परकीया भाव की भक्ति है, किसकी शक्ति थी जो वहाँ तक पहुँच पाता? इसलिये बार-बार गौरांग महाप्रभु जी के गुणों का सरल मन से, निष्कपट मन से कीर्त्तन करो। इस भव-सागर में इस प्रकार का दयालु और कोई नहीं दिखायी देता। श्रीवासुदेव घोष जी दीनता से अपने बारे में कहते हैं कि मैंने भी न जाने कैसे इस शरीर को धारण किया हुआ है? कारण गौरांग नाम करने के बावजूद भी चित्त द्रवित नहीं हो रहा है। मुझे लगता है कि विधि ने शायद मेरे इस हृदय को पाषाण से निर्मित किया है।

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