Bhajana Gīti
Kirtan

श्रीसम्बन्धाधिदेव प्रणामः

Gauḍīya Vaiṣṇava Tradition1 min read
KrishnaRadhaBhakti
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जयतां सुरतौ पंगोर्मम मन्दमतेर्गती।मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधामदनमोहनौ॥ 22॥

श्रीराधा-मदनमोहन की जय हो, अर्थात् वे दोनों सर्वदा सर्वोत्कर्ष से विद्यमान रहें; क्योंकि वे दोनों परमदयालु हैं, मुझ पंगु अर्थात् दूसरे स्थान में जाने की शक्ति से रहित एवं मन्दमति अर्थात् मन्दबुद्धि की भी गति हैं अर्थात् रक्षक हैं तथा जिन दोनों के चरणकमल मेरे सर्वस्वस्वरूप हैं। (22)

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