श्याम! म्हाने चाकर राखो जी।गिरधारी लाल चाकर राखो जी॥चाकर रहसूँ बाग लगासूँ, नित उठ दरसण पासूँ।वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में तेरी लीला गांसू॥चाकरी में दरसण पाऊँ, सुमिरण पाऊँ खरची।भाव भगति जागीरी पाऊँ, तीनू बाताँ सरसी॥मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, गल वैजन्ती माला।वृन्दावन में धेनु चराये, मोहन मुरली वाला॥हरे-हरे नित बाग लगाऊँ, बिच-बिच राखूँ क्यारी।सांवरिया के दरसण पाऊँ, पहर कुसम्बी साड़ी॥जोगी आया जोग करण कूँ, तप करणो संन्यासी।हरि भजन कूँ साधु आया, वृन्दावन के वासी॥मीरा के प्रभु गहर गंभीरा, सदा रहो जी धीरा।आधी रात प्रभु दरसण दीन्हें, प्रेम नदी के तीरा॥
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मंगलाचरण (सपरिकर-श्रीहरि-गुरु-वैष्णव वन्दना)
वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरून् वैष्णवांश्च,
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श्रीगुरुदेव-प्रणाम
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
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नमः ॐ विष्णुपादाय (श्रील तीर्थ महाराज)
नमः ॐ विष्णुपादाय श्रीगौरप्रियमूर्तये।
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