वृन्दावन सों वन नहीं, नन्दगाँव सों गाँव।वंशीवट सों वट नहीं, कृष्ण नाम सों नाम॥
मेरी भव बाधा हरो राधा नागरि सोय।जा तन पै झाँई पड़े श्याम हरित द्युति होय॥
राधा मेरी स्वामिनी, मैं राधे को दास।जनम-जनम मोहे दीजियो, श्रीवृन्दावन को वास॥
सब द्वारन कौ छाँड़ के, मैं आयो तेरे द्वार।श्रीवृषभानु की लाड़ली, जरा मेरी ओर निहार॥
वृन्दावन के वृक्ष कों मरम न जाने कोय।डाल-डाल और पात-पात में श्रीराधे-राधे होय॥
राधा राधा नाम को , जो सपने में जो लेत।ताकूँ मोहन साँवरो, झट अपनों कर लेत॥
चलो सखी वहाँ चालिये जहाँ बसत ब्रजराज।गोरस बेचत हरि मिलें एक पन्थ दो काज॥
बृज चौरासी कोस में, चार गाँव निज धाम।वृन्दावन और मधुपुरी, बरसानों नन्दगांव॥
मुक्ति कहत गोपाल सों मेरी मुक्ति बताए।ब्रज रज उड़ मस्तक लगे मुक्ति मुक्त ह्वै जाय॥
जय जय श्रीराधारमण, जय जय नवलकिशोर।जय गोपी चितचोर प्रभु, जय जय माखनचोर॥
ब्रज रज में ये रज मिलि, रज में यमुना नीर।धन्य भाग्य वा जीव के, जो जामें तजे शरीर॥
राधा राधा कहत ही सब व्याधा मिट जाय।कोटि जनम की आपदा, नाम लिये सों जाय॥