भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे।दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं च विद्धते॥
सदा श्रीमद्वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो।जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥
महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नीलशिखरे।वसन् प्रसादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना॥
सुभद्रा - मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदो।जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे॥ 19 ॥
बायीं भुजा में वेणु, सिरपर मोरपंख, कमर में पीताम्बर एवं अपने नेत्रप्रान्त में सहचरों के कटाक्षों को धारण करनेवाले तथा श्रीवृन्दावन के निवास की लीलाओं से जो सदैव परिचित हैं, वे श्रीजगन्नाथदेव ही मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जायँ। महासमुद्र के किनारे सुवर्ण के समान सुन्दर नीलाचल के शिखर में, अपने बड़े भाई महाबलशाली बलदेवजी के साथ, अपने मन्दिर में निवास करनेवाले, एवं सुभद्रा जिनके बीच में विराजमान है तथा जो समस्त देवताओं को अपनी सेवा का अवसर देते रहते हैं, वे ही श्रीजगन्नाथदेव मेरे नेत्रमार्ग के पथिक बन जाएँ।(19)