दुर्जन संग कबहूँ नहिं कीजै।दुर्जन - मिलन सदा दुखदाई, तिनसों पृथक रहीजै॥ 1॥दुर्जन की मीठी बानी सुनि, तनिक प्रतीति न कीजै।छाड़िय विष सम ताहि निरन्तर, मनहिं थान जनि दीजै॥ 2॥दुर्जन संग कुमति अति उपजै, हरि मारग मति छीजै।छूटै प्रेम - भजन श्रीहरि को, मन विषयन में भीजै॥ 3॥जिनसे सकल शान्ति सुख मन के, सिर धुनि-धुनिकर मीजै।मन अस दुर्जन दुखनिधि परिहरि, सत-संगत रति कीजै॥ 4॥
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Kirtan
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मंगलाचरण (सपरिकर-श्रीहरि-गुरु-वैष्णव वन्दना)
वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरून् वैष्णवांश्च,
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श्रीगुरुदेव-प्रणाम
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
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नमः ॐ विष्णुपादाय (श्रील तीर्थ महाराज)
नमः ॐ विष्णुपादाय श्रीगौरप्रियमूर्तये।
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