Bhajana Gīti
Kirtan

आर केन माया जाले

Bhaktivinoda Ṭhākura1 min read
KrishnaBhakti
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आर केन मायाजाले पड़ितेछ जीव मीन।नाहि जान बद्ध ह’ये रवे तुमि चिरदिन॥
अति तुच्छ भोग-आशे, बन्दी ह’ये माया-पाशे।रहिले विकृत भावे दण्ड्य यथा पराधीन॥
एखन ओ भक्ति बले कृष्ण प्रेम सिन्धु जले।क्रीड़ा करि’ अनायासे थाक तुम कृष्णाधीन॥

हे मछली रूपी जीव! तू क्यों इस माया-जाल में यूँ ही फँस रहा है। तू नहीं जानता कि इससे तू चिर-दिन के लिये अर्थात् एक लम्बे समय के लिए फंस जायेगा। इन अति तुच्छ भोगों की आशा से तू माया के बन्धनों में जकड़ कर ऐसा विकृत भाव से रहेगा जैसे पराधीन व्यक्ति किसी दण्डदाता के पास रहता है। अब भी मौका है तू भक्ति के बल से कृष्ण-प्रेम रूपी जल में क्रीड़ा कर तथा इसमें क्रीड़ा करते-करते तू अनायास भाव से कृष्णाधीन रह।

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