Śrī Gauḍīya Gītiguccha
Kirtan

श्रीश्रीराधा–विनोदविहारि–तत्त्वाष्टकम्

Śrīla Bhakti Prajñāna Keśava Gosvāmī Mahārāja3 min read
Guru TattvaKrishnaRadhaMahaprabhuBhakti
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[नित्यलीलाप्रविष्ट–श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान–केशव–गोस्वामी–महाराजेन–विरचितम्]राधा–चिन्ता–निवेशेन यस्य कान्तिर्विलोपिता।श्रीकृष्ण–चरणं वन्दे राधालिङ्गित–विग्रहम्॥१॥
सेव्य–सेवक–सम्भोगे द्वयोर्भेदः कुतो भवेत्।विप्रलंभे तु सर्वस्य भेदः सदा विविर्द्धते॥२॥
चिल्लीला–मिथुनं तत्त्वं भेदाभेदमचिन्त्यकम्।शक्ति–शक्तिमतोरैक्यं युगपद्वर्त्तते सदा॥३॥
श्रीमती राधारानीके मान करनेपर उनके विरहमें अतिशयनिमग्न होनेसे जिनकी कृष्णवर्णरूप कान्ति विलुप्त होकर श्रीमतीराधा जैसी हुई थी, उन राधाके चिह्नोंसे (कान्तिसे) युक्त–विग्रह—श्रीकृष्णकेचरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ। अथवा (मान भङ्ग होनेपर)श्रीमती राधाद्वारा आलिङ्गित श्रीकृष्णके चरण–कमलोंकी वन्दनाकरता हूँ॥१॥

जब सेव्य अर्थात् भोक्ता भगवान् अपने भोग्य सेवकको उसके साथ मिलित होकर सम्यक् रूपसे भोग करते हैं, तब उनमें भेद ही कहाँ रहता है? अर्थात् उनमें अभेद ही माना जाता है। दूसरी तरफ, विप्रलंभ अर्थात् विरह उपस्थित होनेपर उन सबमें भेद विशेषरूपसे उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है॥२॥

शक्ति और शक्तिमान्का ऐक्य–स्वरूप, चिल्लीला–मिथुन–तत्त्व नित्यकाल अचिन्त्य भेदाभेदरूपमें युगपत् वर्त्तमान रहता है। अर्थात्, परतत्त्व–वस्तु कभी भी निःशक्तिक नहीं है। उस तत्त्वमें शक्ति और शक्तिमान् एकत्व रूपमें नित्य विराजमान रहते हैं। वे पूर्ण चेतनमय लीलापुरुषोत्तम, स्वयं मिथुन–विग्रह हैं अर्थात् स्त्री–पुरुष (शक्ति–शक्तिमान्) के सम्मिलित विग्रह हैं। वही मिथुनविग्रह श्रीराधा–कृष्ण अथवा गौरतत्त्व हैं। उनमें भेद और अभेदरूप विरुद्ध धर्म उनकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे युगपत् नित्य वर्त्तमान रहता है॥३॥

तत्त्वमेकं परं विद्याल्लीलया तद् द्विधा स्थितम्।गौरः कृष्णः स्वयं ह्येतदुभावुभयमाप्नुतः॥४॥
सर्वे वर्णाः यत्राविष्टाः गौर–कान्तिर्विकाशते।सर्व–वर्णेन हीनस्तु कृष्ण–वर्णः प्रकाशते॥५॥
सगुणं निर्गुणं तत्त्वमेकमेवाद्वितीयकम्।सर्व–नित्य–गुणैगौरः कृष्णो रसस्तु निर्गुणैः॥६॥
श्रीकृष्णं मिथुनं ब्रह्म त्यक्त्वा तु निर्गुणं हि तत्।उपासते मृषा विज्ञाः यथा तुषावघातिनः॥७॥

पर–तत्त्व ‘एक’ है; परन्तु वह एक होनेपर भी लीलाद्वारा गौर और कृष्ण—पृथक्–पृथक् दो रूपोंमें अवस्थित होता है। वे (दोनों ही) स्वयं परतत्त्ववस्तु हैं, अथवा तत्त्वतः गौर ही स्वयं कृष्ण हैं तथा ये उभय रूप ही उभयताको प्राप्त होते हैं अर्थात् श्रीगौरसुन्दर श्यामसुन्दर कृष्ण होते हैं तथा श्यामसुन्दर कृष्ण गौरसुन्दर होते हैं॥४॥

यहाँपर आधुनिक जड़ वैज्ञानिकोंके सिद्धान्तद्वारा श्रीगौर और कृष्णरूप उपास्य वस्तुओंका तत्त्व निरूपण किया जा रहा है— जहाँ समस्त वर्णों (रङ्गों) का एकत्र समावेश होता है, वहाँ ‘गौर’ कान्तिका विकास होता है। जैसे सूर्यमें समस्त रङ्गोंके वर्त्तमान रहनेसे उनका रङ्ग गौर (गोरा) है। दूसरी तरफ, जहाँ समस्त वर्णोंका अभाव रहता है अर्थात् जहाँ कोई भी रङ्ग नहीं होता, वहाँ कृष्ण अर्थात् काला प्रकाशित होता है क्योंकि वैज्ञानिकोंके मतानुसार काला कोई रङ्ग नहीं है॥५॥

पूर्व श्लोकके ‘वर्ण’ को इस श्लोकमें ‘गुण’ शब्दसे इङ्गित कर श्रीगौर–तत्त्वको भी श्रीकृष्णके समान उपास्य तत्त्व प्रतिपादित करते हैं— सगुण और निर्गुण तत्त्व एक और अद्वितीय है। समस्त सद्गुणोंकी समष्टि ही श्रीगौरसुन्दर हैं तथा निर्गुणमें अर्थात् सर्वप्रकार गुणहीनतामें श्रीकृष्ण रस–स्वरूप हैं। अर्थात् परतत्त्व वस्तु स्वयं रस स्वरूप हैं; रस निर्गुण और अप्राकृत तत्त्व है, प्राकृत नहीं॥६॥

श्रीविनोदविहारी यो राधया मिलितो यदा।तदाहं वन्दनं कुर्यां सरस्वती–प्रसादतः॥८॥
इति तत्त्वाष्टकं नित्यं यः पठेत् श्रद्धयान्वितः।कृष्ण–तत्त्वमभिज्ञाय गौरपदे भवेन्मतिः॥९॥

श्रीकृष्ण अथवा गौर—मिथुन ब्रह्म हैं। उनको (उनका भजन) परित्याग कर मिथ्याज्ञानी जन (अज्ञानी) भूसा कूटनेवालोंकी तरह निर्गुण ब्रह्मकी व्यर्थ ही उपासना करते हैं अथवा भूसा कूटनेवाले चावल पानेकी आशासे जिस प्रकार व्यर्थ ही परिश्रम करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानीजन भी कृष्णसेवा परित्याग कर निर्गुण ब्रह्मकी उपासना द्वारा केवल श्रम–ही–श्रम प्राप्त करते हैं अर्थात् उससे यथार्थ मुक्ति कभी नहीं मिलती॥७॥

जब श्रीविनोदविहारी कृष्ण श्रीमती राधिकाके साथ मिलित होते हैं, तब श्रील सरस्वतीके प्रसादसे अर्थात् श्रीगुरुदेवकी कृपासे (दर्शन लाभ कर) मैं उनकी वन्दना करता हूँ॥८॥

जो इस तत्त्वाष्टकको श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन पाठ करेंगे, वेश्रीकृष्ण तत्त्वको पूर्णरूपसे अवगत होकर श्रीगौरसुन्दरके चरणोंमेंमति लाभ करेंगे॥९॥
कलयति नयनं दिशि दिशि वलितम्।पङ्कजमिव मृदु–मारुत–चलितम्॥
केलि–विपिनं प्रविशति–राधा।प्रतिपद–समुदित मनसिज–वाधा॥
विनिदधति मृदु–मन्थर–पादम्।रचयति कुञ्जर–गतिमनुवादम्॥
जनयति रुद्र–गजाधिप–मुदितम्।रामानन्दराय–कवि–गदितम्॥

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