Bhajana Gīti
Kirtan

हरि हरि विफले जनम गोँआइलु

Narottama Dāsa Ṭhākura1 min read
KrishnaRadhaMahaprabhuNityanandaHarinamBhakti
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हरि हरि! विफले जनम गोडाइनु।मनुष्य जनम पाइया,राधाकृष्ण ना भजिया,जानिया शुनिया विष खाइनु॥
गोलोकेर प्रेमधन,हरिनाम-संकीर्तन,रति ना जन्मिल केने ताय।संसार-विषानले,दिवानिशि हिया ज्वले,जुड़ाइते ना कैनु उपाय॥
व्रजेन्द्रनन्दन येइ,शचीसुत हैल सेइ,बलराम हइल निताइ।दीनहीन यत छिल,हरिनामे उद्धारिल,तार साक्षी जगाइ-माधाइ॥
हा हा प्रभु नन्दसुत,वृषभानुसुतायुत,करुणा करह एइबार।नरोत्तम दास कय,ना ठेलिह रांगा पाय,तोमा बिने के आछे आमार॥

हरि! हरि!! मैंने तो वृथा ही अपना जन्म गंवा दिया। सदुर्लभ मनुष्य जीवन पाकर भी मैंने श्रीराधा-कृष्ण जी का भजन नहीं किया। मैंने जानबूझ कर सांसारिक विषय रूप विष को खा लिया। गोलोक का प्रेमधन, जो हरिनाम- संकीर्त्तन है, उसमें मेरी जरा सी भी रति-मति नहीं हुई तथा संसार रूपी विषानल से दिन-रात मेरा हृदय जल रहा है,इसको शीतल करने का भी उपाय मैंने नहीं किया। जो व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं, वे ही शचीनन्दन-गौरांग रूप से अवतीर्ण हुए हैं तथा बलराम जी नित्यानन्द प्रभु हो गये हैं। जितने भी दीन-हीन थे, सभी का इन्होंने हरिनाम-संकीर्तन के द्वारा उद्घार कर दिया, इस बात के गवाह जगाइ और माधाइ हैं। हे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण! आप वृषभानुसुता श्रीमति राधा रानी के साथ एक बार मुझ पर करुणा कीजिये। नरोत्तम ठाकुर जी कहते हैं, हे प्रभो! आप मुझे अपने इन अरुणवर्ण चरण-कमलों से दूर मत करना। आपके बिना मेरा और है ही कौन?

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