गणइते दोष,गुण-लेश न पाओबि,यब तुहुँ करबि विचार।तुहुँ जगन्नाथ,जगभरि कहाओसि,जग बाहिर नहीं मुइ छार॥
किये मानुष पशु,पाखि किये जनमियेअथवा कीट पतंगे।करम-विपाके,गतागति पुनः पुनः,मति रहु तुया परसंगे॥
भणये विद्यापति,अतिशय कातर,तरइते इह भवसिन्धु।तुया पद-पल्लव,करि अवलम्बन,तिल एक देह दीनबन्धु॥
माधव! मैं आपसे प्रगाढ़ विनती करता हूँ। मैंने तुलसी व तिल देकर इस देह को आपके समर्पण कर दिया है। बस आप ज़रा सा कृपा-वर्षण मुझ पर कर देना। यदि आप मेरे बारे में विचार करोगे तो दोष ही दोष आपको गिनने को मिलेंगे, लेशमात्र भी गुण आप मुझमें नहीं पाओगे........ (ठाकुर! मुझ पर कृपा अवश्य करना) ......... आप तो जगन्नाथ हैं, जगत् का भरण-पोषण करने वाले कहलाते हैं, फिर नगण्य सा मैं जगत् के बाहर तो नहीं। हे प्रभो! आपसे सिर्फ इतनी सी प्रार्थना है कि चाहे मनुष्य, पशु या पक्षी के रूप में मैं क्यों न जन्मूँ अथवा कीट-पतंग ही क्यों न हो जाऊँ — मेंरे कर्मानुसार इस कर्म-विपाक के आवागमन में मैं भले ही चलता रहूँ परन्तु आपके नाम-रूप-गुण व लीला आदि में मेरी मति लगी रहे। अतिशय कातर होकर ‘विद्यापति जी’ कहते हैं — हे दीनबन्धु! इस भवसागर से पार होने के लिये मैंने आपके पादपद्मों को अवलम्बन किया है — आप तिलमात्र कृपा अवश्य करना।