Bhajana Gīti
Kirtan

गोपीनाथ आमार

Bhaktivinoda Ṭhākura2 min read
Bhakti
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गोपीनाथ, आमार उपाय नाइ।तुमि कृपा करि’, आमारे लइले, संसारे उद्धार पाइ॥ 1॥
गोपीनाथ, प’ ड़ेछि मायार फेरे।धन, दारा, सुत, घिरेछे आमारे, कामेते रखेछे जेरे॥ 2॥
गोपीनाथ, मन ये पागल मोर।ना माने शासन,सदा अचेतन, विषये रयेछे घोर॥ 3॥
गोपीनाथ, हार ये मेनेछि आमि।अनेक यतन, हइल विफल, एखन भरोसा तुमि॥ 4॥
गोपीनाथ, केमने हइवे गति।प्रबल इन्द्रिय-वशीभूत मन, ना छाड़े विषय-रति॥ 5॥
गोपीनाथ, हृदये बसिया मोर।मनके शमिया, लह निज पाने, घुचिवे विपद घोर॥ 6॥
गोपीनाथ, अनाथ देखिया मोरे।तुमि हृषीकेश, हृषीक दमिया, तार हे संसृति-घोरे॥ 7॥
गोपीनाथ, गलाय लेगेछे फाँस।कृपा-असि धरि’ , बन्धन छेदिया, विनोदे करह दास॥ 8॥

हे गोपीनाथ जी! मेरे उद्घार का और कोई उपाय नहीं है आप यदि कृपा करके मुझे अपना लो तो मैं इस संसार से छुटकारा पा सकता हूँ अन्यथा नहीं। हे गोपीनाथ जी! मैं माया के बन्धनों में फँस गया हूँ। धन-स्त्री-पुत्र — इन सब ने मुझे घेर रखा है तथा कामना-वासना से जकड़ कर रखा हुआ है और गोपीनाथ जी! ये मेरा मन भी पागल है। कुछ शासन ही नहीं मानता, हमेशा बे-होश सा रहता है और घोर विषयों में डूब गया है। हे गोपीनाथ! मैंने तो हार मान ली है। मेरी अनेकों प्रकार की कोशिशें फेल हो गयी हैं। अब तो मात्र आपका ही भरोसा है। हे गोपीनाथ! किस प्रकार से मेरी सुगति होगी। मेरा मन प्रबल-इन्द्रियों के वशीभूत हो गया है और विषयों के प्रति जो रति है उसे ये मन छोड़ता ही नहीं है। हे गोपीनाथ जी! आप कृपा करके मेरे हृदय में बैठकर मेरे मनको वशीभूत कीजिये तथा इसे अपनी सेवा में ले जाइये। आपके इस प्रकार करने से मेरी घोर विपदा खत्म हो जायेगी। हे गोपीनाथ जी! मुझे अनाथ देखकर आप मुझ पर ये कृपा कीजिये कि आप करुणा करके मेरी इन्द्रियों का दमन कर दीजिये और मुझे इस घोर संसार से पार लगाइये। हे गोपीनाथ जी! मेरे गले में फाँसी का फंदा लगा है, आप कृपा रूपी तलवार लेकर इस बन्धन को काट दीजिये तथा इस भक्ति विनोद को अपना दास बना लीजिये।

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