हे गोपीनाथ! मेरा निवेदन सुनिये, मैं विषयी दुर्जन हूँ तथा हमेशा कामना-वासनाओं में मशगूल रहता हूँ तथा गुण मुझमें कुछ भी नहीं हैं। हे गोपीनाथ! मेरा भरोसा सिर्फ आप ही हो। आपके श्रीचरणों में मैंने शरण ले ली है तथा मैं आपका ही दास हूँ। हे गोपीनाथ जी! आप मेरा शोधन किस प्रकार से करोगे। कारण, मैं ज़रा सा भी भक्ति के बारे में नहीं जानता हूँ। कर्मों में मेरी मति बिल्कुल जड़ हो गयी है तथा इस घोर-संसार में पड़ा हुआ हूँ। हे गोपीनाथ! ये सभी आपकी ही माया है। मेरी तो न किसी प्रकार की सामर्थ्य है और न सुनिर्मल ज्ञान है और न ही मेरे अपने अधीन ये काया ही है। हे गोपीनाथ! मुझे अपने चरणों में स्थान दीजिये। ये पामर रो-रोकर आपके श्रीचरणों में स्थान माँगता है। आप मुझे करुणा का दान दीजिये अर्थात् मुझ पामर पर कृपा कीजिये। हे गोपीनाथ जी! आप तो सब कुछ करने में समर्थ हो। दुर्जन का उद्घार करने की सामर्थ्य आपमें है और फिर इस पापी का और है ही कौन? हे गोपीनाथ! आप तो कृपा के समुद्र हो, जीवों के लिये ही आप प्रपंच में आये हो और यहाँ पर आपने अपनी लीलाओं को विस्तारित किया है। हे गोपीनाथजी! मैं कौन से दोष का दोषी हूँ कि सभी असुरों ने आपके चरणों की प्राप्ति कर ली और ये विनोद यूँ ही बैठा रह गया।