Bhajana Gīti
Kirtan

छाँड़ि मन

Sūradāsa1 min read
Sadhu SangaKrishnaSurdas
Study with Shastra AIPDF
छाँड़ि मन, हरि-विमुखन को संग।जिनके संग कुबुद्धि उपजत है, परत भजन में भंग॥कहा होत पय पान कराये, विष नहिं तजत भुजंग।कागहि कहा कपूर चुगाये, स्वान न्हवाये गंग॥खर को कहा अरगजा-लेपन, मरकट भूषण अंग।गज को कहा न्हवाय सरितन, बहुरि धरै खहि छंग॥पाहन पतित बाँस नहीं बेधत, रीतो करत निषंग।सूरदास खल कारी कामरि, चढ़त न दूजो रंग॥

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